मैं फिर..अग्निपाखी..!!

अनवरत संघर्षों का धधकता अग्निकुंड..
समिधा देह की..
अधूरे स्वप्नों की..
जो शेष रहा लिपटा रह गया अस्तित्व से..
जैसे अंगारे में बची रह जाती है राख..
धीमे धीमे सुलगती सी..
शायद फिर भी सम्भावना बची है..!!
इस निर्दोष सम्भावना की ढीठ उपस्थिति
फिर से सर उठाती है...
होती है इस अंतर्दहन  की राख से
फिर उपजने की कोशिश..
और मैं फिर..
अग्निपाखी..

11 comments:

  1. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (2.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  2. इस निर्दोष सम्भावना की ढीठ उपस्थिति
    फिर से सर उठाती है...
    होती है इस अंतर्दहन की राख से
    फिर उपजने की कोशिश..
    yahi to jijivisha hai....

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  3. यही प्रयास निरंतर बना रहना चाहिए
    अच्छी प्रस्तुति

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  4. कुछ संवेदनाओ को एक धधकने के लिये एक चिंगारी की जरूरत होती है……………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

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  5. "निर्दोष सम्भावना की ढीठ उपस्थिति
    फिर से सर उठाती है..."
    samvedna dil ke bhitri parat ko chhuti hui...abhar!!

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  6. होती है इस अंतर्दहन की राख से
    फिर उपजने की कोशिश..
    और मैं फिर..
    अग्निपाखी..

    Excellent creation !

    .

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  7. समिधा देह की..
    अधूरे स्वप्नों की..
    जो शेष रहा लिपटा रह गया अस्तित्व se..


    bahut hi sunder rachna hai
    sab kuch khatma hone ke bad bhi kuchh shesh rah jata hai ..yahi jeevan chakra hai ....

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  8. फिर से सर उठाती है...
    होती है इस अंतर्दहन की राख से
    फिर उपजने की कोशिश..
    और मैं फिर..
    अग्निपाखी..

    बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !
    शुभकामनायें !

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  9. आप सभी के स्नेह से अभिभूत हूँ..अचानक यूँ ही सा लिखा..आपको अच्छा लगा..मेरा सौभाग्य.

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  11. निर्दोष संभावना की ढीठ उपस्थ्तिती,
    ये सिर्फ आप सोच सकती है मनीषा दि

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