पता है तुम्हें..!!

  
कुछ अक्षरों को मनाकर..
अभी उनमें सहेजा है
हरापन जो सावन में लहका था..
सर्दियों की गुनगुनी धूप
जो सरहाने रख ली थी..

बसंत की पीली सरसों
छुपा ली है उसमें..
और हाँ..
झरते पत्तों को भी समेट लिया है..
अब ये अक्षर उगने लगे हैं..
मेरी डायरी में..
पता है तुम्हें..!!

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