दीवार पर टंगी तस्वीर पर
लगभग..शाम चार बजे..
हर रोज़ एक धूप का टुकड़ा आ ठहरता है..
और मैं निर्निमेष ताकती हूँ..
तस्वीर पर रुका आंसू
किसी दिन तो सूखे..!!
सूनी सड़क पर
दिन चलता रहा सिर झुकाए..
और..गुलमोहर सुलगता रहा
पिघलते कोलतार पर..
हथेली में रखे अंगार सा..!!
बस अभी लिखा ही था..
..''तुम''..
गुलाबी परदे से छन् से आकर
ठीक सामने बैठ गई धूप..
झरने लगे आतिशी गुलमोहर..
और..की बोर्ड से टकरा कर
कांच की चूड़ियाँ जिरह करने लगीं..
इससे पहले के और कुछ लिखूं ..
मौन व्याप गया..!!
1. मैं रोपती हूँ स्वप्न/ 
   और सींचती हूँ उन्हें आंसुओं से /
   स्वप्न लताएँ लिपटने लगतीं है आत्मा से /
   आँखें रीत जाती हैं..



2 तुम्हारी सनातन यात्रा..
   मुझे रोक लेती है..
  ठहर जाती हूँ ताकि तुम चल सको.. 
  वक़्त के फ्रेम में जड़ी हुई मैं..
  छीने गए सब शब्दों को तरस कर देखती हूँ.
  यूँ चुपचाप रुके  प्रेम करना..
  तुम्हारी भटकन से  ज्यादा मुश्किल है..
  बेहद मुश्किल..!!

मैं सचमुच स्याह हो जाती हूँ ..!!


वो कभी नहीं देखता मेरी आँखों में..
जब लौटता है ..
सौंप कर अपने माथे की रेखाएं
कनपटी से बहता पसीना..
पलट जाता है..
मैं दिन भर अपने हिस्से के सूरज में सुलगते..
अपने पसीने की लकीरों को पोंछती
उसका पसीना आँचल में समेट लेती हूँ..
धुंए में तुम  सँवला गयी हो..
है न..?
उसका ये कहना..
मुझे भस्म करता  मुझ पर से होकर गुज़र जाता है..
और मैं सचमुच  स्याह हो जाती हूँ ..!!


बहुत कुछ गुज़रता है दिन भर..

बहुत कुछ गुज़रता है दिन भर..
बेवजह खर्च होते लम्हे
और..मासूम सपनों का आत्मघात..
फिर भी न जाने क्यूँ
कुछ बचा रह जाता है..
जो अपने बस स्याह और सफ़ेद होने से नाराज़ है..
आँख मिलकर मांगता है अपने हिस्से के रंगों को..
हर रात एक समझौता फिर होता है..
ये जानते हुए भी के कल तुम फिर टूटोगे..
लो सौंप दिया..
फिर एक रंगीन तिलिस्म..!!




जब सोचती हूँ तुम्हें..


जब सोचती हूँ तुम्हें..
एक धुन गूंजती है..
स्वरों के व्याकरण से परे..
अपरिभाषित..अर्थवान..
मंदिर में कांपती दीपशिखा सम्मोहन सा रचती है..
धूप की सुगंध घेर लेती है मुझे..
और मैं.. 
तुम्हारे नाम की प्रदक्षिणा करने लगती हूँ..!!